Thursday, May 15, 2008

आजकल

आजकल सोता कम और ज्यादा जागता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

कभी इधर तो कभी उधर
कभी यहाँ तो कभी वहाँ
दिन भर तो सपनों के आगे पीछे भागता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

अपनों को अपना बनाना है मुझे
कुछ बन के उन्हें दिखाना है मुझे
उठते बैठते दिन रात यही राग अलापता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

ये धुन बसी मेरे मन में जब से
दूर हो गया मैं अपनों से तब से
बस अब अपनों को अपने पास चाहता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं

वो मुझ में हैं जिसने मुझे बनाया है
पर हाथ में अब तक नहीं आया है
हज़ार बार लाश की तरह खुद को तलाशता हूँ मैं
यह सच नहीं है कि सपनों से दूर भागता हूँ मैं


सिएटल,
14 फ़रवरी 2008

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