Sunday, November 16, 2014

न तुम होते, न हम होते

न तुम होते, न हम होते

तो फिर कहाँ ग़म होते

'गर होता कोई घर भी कहीं
तो हम न यहाँ सनम होते

दल होता, दलदल होते
झगड़े बड़े विषम होते

हाँ में हाँ मिलाते मगर
ख़्वामख़ाह आपको वहम होते

न रूठता राहुल, न मनता कभी
तो यार भी यारो कम होते

16 नवम्बर 2014
सिएटल | 513-341-6798

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1 comments:

Anonymous said...

कविता की हर दो lines अच्छी लगीं। यह lines मज़े की हैं :

"हाँ में हाँ मिलाते मगर
ख़्वामख़ाह आपको वहम होते"

"म" से end होने वाले शब्दों में "विषम" और "वहम" का चुनाव अच्छा लगा।

आख़री की lines से ending बढ़िया हुई:

"न रूठता राहुल, न मनता कभी
तो यार भी यारो कम होते"