Monday, November 14, 2016

मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि


मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि

मेरा घर इतना छोटा है कि

इसके चारों कोनों में 

बादल एक सा पानी बरसाता है

और सूरज धूप


हवा भी एक सी चलती है

और सारी घड़ियों में 

समय भी एक सा रहता है


वरना

मैं अपने परिवार को

बिना भेदभाव के

एक सा कैसे रख सकता

कहीं गर्मी होती, तो कहीं सर्दी

कहीं सूखा होता, तो कहीं दलदल


मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि

मेरा परिवार छोटा है

वरना 

बात-बात पर दंगे-फ़साद होते

कभी भाषा पर

तो कभी धर्म पर


मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि

मेरी तनख़्वाह इतनी नहीं कि

सम्हाल सकूँ

और शक्तिशाली इतना नहीं कि

बॉडीगार्ड रखूँ 


मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि

मैं समाज का एक अदना सा पुर्ज़ा हूँ

फ़रिश्ता हूँ, हैवान हूँ

महज़ एक इन्सान हूँ


रोज़ जूझता हूँ

काम, क्रोध, मद, लोभ से

झूठ नहीं कहूँगा

कि

क्रोध नहीं करता

या लोभ नहीं होता

लेकिन 

मेरे क्रोध से

तो समंदर सूखा

और ही मेरे लोभ से

सोने की लंका बनी


मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि

मेरा घर इतना छोटा है कि ...


गुरूपूरब 2016

सिएटल | 425-445-0827

tinyurl.com/rahulpoems 





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