Tuesday, December 6, 2016

अपने ही हाथों बुझाता हूँ अपना दीया

अपने ही हाथों 

बुझाता हूँ अपना दीया

लगा के अलार्म

छुपा के सर

ओढ़ के पाबंदियाँ 


मुझे क्या पता

कि वो था आख़री दिन

जल रहा था दीप

जलने ना दिया


आदत के वशीभूत

हम हैं इतने स्वचालित 

कि 'हाऊ आर यू' के जवाब पे

तवज्जो किया


चलते-फिरते ही

सब कुछ हो जाता है आजकल

मंडप, रंगत

कोर्ट में ही विदा हो जाती हैं लड़कियाँ 


मैंने हमेशा कहा

कि तुम थी ग़लत 

चलो दोनों में से एक ने

कुछ तो सही किया


6 दिसम्बर 2016

सिएटल | 425-445-0827

tinyurl.com/rahulpoems 




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